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गोंड विवाह

कोयतुर समुदाय में विवाह केवल दो व्यक्तियों का बंधन नहीं, बल्कि दो कुलों, दो परिवारों, प्रकृति और पुरखों के आशीर्वाद से आरंभ होने वाला एक पवित्र संस्कार है। यह परंपरा कोयतुर समुदाय के उस जीवन-दर्शन को दर्शाती है, जिसमें मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका अभिन्न अंग मानता है। विवाह से पूर्व और विवाह के प्रत्येक महत्वपूर्ण अनुष्ठान में पेन - पुरखे, धरती, जल, वन, पर्वत तथा साजा जैसे पवित्र वृक्षों का स्मरण किया जाता है। कोयतुर मान्यता के अनुसार, इन्हीं के संरक्षण और आशीर्वाद से जीवन में सुख, समृद्धि, संतुलन और वंश की निरंतरता बनी रहती है। इसलिए विवाह केवल परिवार का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। इसी प्रकार, कोयतुर समुदाय में पुरखे—अर्थात परिवार के वे सदस्य जिनका देहावसान हो चुका है—आज भी परिवार के मार्गदर्शक और संरक्षक माने जाते हैं। यह विश्वास है कि वे अदृश्य रूप से अपने वंशजों की रक्षा करते हैं और शुभ अवसरों पर अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं। विवाह के समय उनका स्मरण कर नवदंपति के सुखमय जीवन, उत्तम संतान, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है। यह परंपरा बताती है कि जीवन केवल वर्तमान पीढ़ी का नहीं, बल्कि अतीत, वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को जोड़ने वाली एक निरंतर धारा है। कोयतुर की प्रत्येक रस्म प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, समुदाय के प्रति उत्तरदायित्व और पुरखों के सम्मान का संदेश देती है। यही कारण है कि यह परंपरा केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि कोयतुर संस्कृति, आस्था और जीवन-दर्शन की जीवंत पहचान है। इसमें प्रकृति को माता, पुरखों को संरक्षक और विवाह को जीवन एवं सृष्टि के संतुलन को आगे बढ़ाने वाला पवित्र संकल्प माना जाता है।
रेला पाटा

रेला पाटा केवल मनोरंजन नहीं बल्कि संस्कृति, इतिहास, परंपरा, प्रकृति और देवताओं का जीवित अभिलेख होते हैं।

गोंड गोटुल

हमारी संस्कृति, हमारी
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अपनी जड़ों से जुड़ने, लोक-संस्कृति को संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों तक हमारी विरासत पहुँचाने का डिजिटल मंच।

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