"जब धरती पर कोई सीमा नहीं थी, कोई देश नहीं था, कोई धर्म नहीं था और कोई भाषा भी नहीं थी, तब केवल मनुष्य और प्रकृति का रिश्ता था। यही रिश्ता आज भी कोयतुर समाज की आत्मा है।"
मानव सभ्यता का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है। यह उस पहली यात्रा की कहानी है, जब हमारे पूर्वज अफ्रीका की धरती से निकलकर हजारों वर्षों में पूरी दुनिया में फैल गए। यह यात्रा किसी विजय अभियान की नहीं थी, बल्कि जीवन की खोज, भोजन की तलाश, सुरक्षित आश्रय और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीने की यात्रा थी। इसी यात्रा ने मानव सभ्यता को जन्म दिया और इसी यात्रा ने दुनिया की विविध संस्कृतियों, भाषाओं और समुदायों को आकार दिया।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि आधुनिक मानव होमो सेपियन्स (Homo sapiens) का उद्भव लगभग तीन लाख वर्ष पहले अफ्रीका में हुआ। हजारों वर्षों तक मानव वहीं रहा। धीरे-धीरे जलवायु परिवर्तन, भोजन की उपलब्धता, पशुओं के झुंडों का पीछा करते हुए और नए क्षेत्रों की खोज में मनुष्य छोटे-छोटे समूहों में अफ्रीका से बाहर निकलने लगा। यही वह ऐतिहासिक क्षण था, जिसने पूरी पृथ्वी के इतिहास की दिशा बदल दी।
लगभग 70 हजार वर्ष पहले कुछ मानव समूह अफ्रीका से निकलकर अरब प्रायद्वीप पहुँचे। वहाँ से वे दक्षिण एशिया, भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और आगे ऑस्ट्रेलिया तक फैल गए। कुछ समूह मध्य एशिया होते हुए यूरोप पहुँचे। बाद में हिमयुग के दौरान समुद्र का स्तर कम होने पर बेरिंग स्थल सेतु के माध्यम से मनुष्य उत्तर अमेरिका पहुँचा और फिर दक्षिण अमेरिका तक फैल गया। हजारों वर्षों की इस यात्रा में मनुष्य ने किसी भूमि पर अधिकार नहीं किया, बल्कि प्रकृति से सीखते हुए स्वयं को उसके अनुरूप ढालता गया।
यही कारण है कि मानव इतिहास का सबसे बड़ा शिक्षक कोई विद्यालय नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन रहे हैं।
मनुष्य ने सबसे पहले नदी के किनारे रहना सीखा। उसने जंगल से भोजन प्राप्त किया। उसने पेड़ों से औषधियाँ सीखीं। उसने पशुओं से रास्ते पहचाने। उसने पक्षियों से मौसम को समझा। उसने पहाड़ों से धैर्य सीखा और धरती से जीवन। प्रकृति ही उसकी पहली गुरु थी। यदि आज दुनिया में कोई समुदाय इस प्राचीन जीवन-दर्शन को सबसे अधिक जीवित रखे हुए है, तो वह कोयतुर समाज है।
कोयतुर समाज स्वयं को प्रकृति से अलग नहीं मानता। वह जंगल का मालिक नहीं, बल्कि उसका संरक्षक है। वह नदी का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसका रक्षक है। वह धरती का स्वामी नहीं, बल्कि उसका पुत्र है। यही दर्शन हजारों वर्षों से आदिवासी जीवन की सबसे बड़ी पहचान रहा है। जब हम गोंड, मुंडा, संथाल, भील, उरांव, माड़िया, मुरिया, हल्बा, बैगा और भारत के अन्य जनजातीय समुदायों को देखते हैं, तो महसूस होता है कि इनके जीवन में आज भी वही प्रकृति-केंद्रित संस्कृति दिखाई देती है, जिसने मानव सभ्यता को जन्म दिया था।
कोयतुर समाज के लिए जंगल केवल लकड़ी नहीं है।
जंगल भोजन है।
जंगल दवा है।
जंगल संस्कृति है।
जंगल त्योहार है।
जंगल संगीत है।
जंगल पूर्वजों की स्मृति है।
जंगल भविष्य की आशा है।
इसी प्रकार जल केवल पीने का साधन नहीं है। नदी उनके लिए माँ है। प्रत्येक नदी, प्रत्येक झरना, प्रत्येक तालाब जीवन का स्रोत है। इसलिए कोयतुर समाज जल का उपयोग करता है, उसका शोषण नहीं। जमीन भी उनके लिए केवल संपत्ति नहीं है। वह मातृभूमि है। उसी मिट्टी में पूर्वजों की स्मृतियाँ हैं। उसी मिट्टी में अगली पीढ़ियों का भविष्य है। इसीलिए कोयतुर दर्शन में एक गहरा संदेश मिलता है—प्रकृति से उतना ही लो, जितनी आवश्यकता हो; शेष आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ दो।
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट, भूमि क्षरण और जैव विविधता के संकट से जूझ रही है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जंगल समाप्त हुए, नदियाँ सूख गईं और मिट्टी की उर्वरता खत्म हो गई, तो मानव सभ्यता भी संकट में पड़ जाएगी। विडंबना यह है कि आधुनिक विकास की दौड़ में हम उसी जीवन-दर्शन को भूलते जा रहे हैं जिसने मानव को लाखों वर्षों तक जीवित रखा। हमारे पूर्वजों ने पृथ्वी को संसाधन नहीं, बल्कि रिश्ते के रूप में देखा। कोयतुर समाज आज भी पेड़ काटने से पहले अनुमति मांगता है। बीज बोने से पहले धरती माता का स्मरण करता है। नई फसल आने पर प्रकृति का धन्यवाद करता है। नदी पार करने से पहले जल को प्रणाम करता है। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का भाव है।
आज विज्ञान भी यही कह रहा है कि पृथ्वी को बचाने के लिए हमें प्रकृति आधारित जीवनशैली अपनानी होगी। यही जीवनशैली सदियों से कोयतुर समाज जीता आया है। यदि हम मानव प्रवास के इतिहास को देखें, तो पाएँगे कि मनुष्य जहाँ भी गया, उसने स्थानीय प्रकृति के अनुसार अपने जीवन को ढाला। उसने नए पौधों को पहचाना, नए पशुओं को जाना, नई जलवायु को अपनाया। इसी प्रक्रिया में दुनिया की हजारों संस्कृतियाँ विकसित हुईं। लेकिन इन सभी संस्कृतियों की जड़ एक ही थी—प्रकृति के साथ सहअस्तित्व। इसीलिए जब हम अफ्रीका से मानव की यात्रा का मानचित्र देखते हैं, तो वह केवल एक भूगोल नहीं दिखाता, बल्कि यह बताता है कि पूरी मानव जाति का मूल एक ही है। हम सब उसी पहली यात्रा के वंशज हैं।
जातियाँ बाद में बनीं।
देश बाद में बने।
सीमाएँ बाद में बनीं।
लेकिन पृथ्वी पहले थी।
प्रकृति पहले थी।
और मानवता पहले थी।
यह विचार कोयतुर दर्शन से पूरी तरह मेल खाता है। आदिवासी समाज किसी सीमा से पहले प्रकृति को पहचानता है। उसके लिए जंगल का कोई पासपोर्ट नहीं होता, नदी किसी धर्म की नहीं होती और हवा किसी एक देश की नहीं होती। आज जब दुनिया पर्यावरण संरक्षण की नई-नई नीतियाँ बना रही है, तब हमें अपने कोयतुर समुदायों के पारंपरिक ज्ञान से सीखने की आवश्यकता है। जल संरक्षण, सामुदायिक वन प्रबंधन, जैव विविधता का संरक्षण, पारंपरिक खेती, बीजों का संरक्षण, औषधीय पौधों का ज्ञान और सामूहिक जीवन की संस्कृति—ये सब मानवता की अमूल्य धरोहर हैं।
हमारे पूर्वजों ने हमें केवल शैलचित्र नहीं दिए।
उन्होंने हमें जंगल दिए।
उन्होंने हमें नदियाँ दीं।
उन्होंने हमें उपजाऊ धरती दी।
उन्होंने हमें पक्षियों का संगीत दिया।
उन्होंने हमें ऋतुओं का संतुलन दिया।
उन्होंने हमें साँस लेने योग्य हवा दी।
अब प्रश्न यह है कि क्या हम भी अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए यही सब छोड़ पाएँगे?
आज हमारी जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बड़ी है। यदि हमारे पुरखों ने गुफाओं की दीवारों पर अपनी पहचान छोड़ी, तो हमें धरती पर अपना उत्तरदायित्व छोड़ना होगा।
हमारी पहचान ऊँची इमारतें नहीं होंगी।
हमारी पहचान स्वच्छ नदियाँ होंगी।
हमारी पहचान हरे-भरे जंगल होंगे।
हमारी पहचान उपजाऊ खेत होंगे।
हमारी पहचान स्वच्छ हवा होगी।
हमारी पहचान वह पृथ्वी होगी जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ स्वस्थ जीवन जी सकें। यदि आज हम जल बचाते हैं, तो हम केवल पानी नहीं बचा रहे, बल्कि भविष्य बचा रहे हैं। यदि हम जंगल बचाते हैं, तो हम केवल पेड़ नहीं बचा रहे, बल्कि संस्कृति बचा रहे हैं। यदि हम मिट्टी बचाते हैं, तो हम केवल खेती नहीं बचा रहे, बल्कि सभ्यता बचा रहे हैं।मानव की पहली यात्रा अफ्रीका से शुरू हुई थी। लेकिन मानवता की अगली यात्रा इस बात पर निर्भर करेगी कि हम प्रकृति के साथ अपना संबंध कितना मजबूत रखते हैं।
कोयतुर समाज हमें सिखाता है कि विकास और प्रकृति विरोधी नहीं हैं। विकास वह है जिसमें नदी भी बहे, जंगल भी रहे, खेत भी लहलहाएँ और मनुष्य भी सम्मानपूर्वक जीवन जी सके। आज पूरी दुनिया को उसी दर्शन की आवश्यकता है जिसे कोयतुर समाज हजारों वर्षों से जीता आ रहा है—जल, जंगल और जमीन का सम्मान ही जीवन का सम्मान है।
जब भविष्य की पीढ़ियाँ पीछे मुड़कर हमारी ओर देखें, तो वे केवल यह न कहें कि हमने आधुनिक शहर बनाए, बल्कि वे यह भी कहें कि हमने पृथ्वी को बचाया। हमने नदियों को जीवित रखा। हमने जंगलों को साँस लेने दी। हमने मिट्टी को उर्वर बनाए रखा। हमने प्रकृति और संस्कृति दोनों की रक्षा की। यही हमारे पुरखों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी विरासत होगी।
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